सोमवार, 6 अप्रैल 2015

ब्रजेश कुमार पाण्डे एडवोकेट

मैं  उनसठ का

प्रकाशक  NANI PALKIWALA LAW FOUNDATION

 SHAHJAHANPUR    मूल्य । १०० /-

प्रथम संस्करण  जनवरी २०१५


अब उनसठ का हुआ मैं  पूरा,
फ़र्ज़  हुए सब पूरे । 
स्वप्न हो गए सारे पूरे,
रहे न कोई अधूरे ।   
अब बस यही कामना प्रभु से,
जनहित में लग  जाऊँ   ।।
सेवा करूँ  ,बार, की पूरी,
उसका मान बढ़ाऊँ ।।



पाण्डे जी की छोटी सी काव्य संग्रह  एक  निराले रंग की रचनाओं का संग्रह है

जो जनपद और देश के जाने माने लोगों के बारे में उनके विचार व्यक्त करता है तथा कविता का पहला अछर उस ही
व्यक्ति के नाम का हिस्सा है

भाषा पर उनकी पकड़ ग़ज़ब की है 

वह केवल " बार " की ही सेवा में नहीं लगे हैं " बार " के बाहर भी वह सब की सहायता करें में विश्वास करते हैं 
 

गुरुवार, 29 जनवरी 2015

सरोज कुमार मिस्र


भँवरा गुनगुन कर रहा,
कोयल गाये गीत।
लो वे क्षण भी आ गये,
जो थे आशातीत।।
2
बासन्ती मौसम हुआ,
पोर पोर में पीर।
रति की सूनी सेज पर 
चुभें काम के तीर।।
3
सरसों ने धरती रंगी,
पीली चूनर डाल।
देखा देखी लाल है,
फूलो के भी गाल।।
4
आहट फागुन की सुनी,
मन के मिटे मलाल।
भर भर मुटठी प्रिय मलो,
मुख पर लाल गुलाल।।
सरोज मिश्र

रविवार, 4 जनवरी 2015

बसती

ये चंद लोग जो बस्ती में सब से अच्छे हैं
इन्हीं का हाथ है मुझ को बुरा बनाने में


तेरी निगाह करम हम पे कुछ ज़्यादा है
ज़माने तू ही बता  क्या तेरा इरादा है


कब की मरहूम हुई ज़िंदा दिली पर हम ने,
हंस के अकसर दिले ज़िंदा का भ्रम रखा है

बाहर से तो पहले की तरह अब हूँ सालिम,
लेकिन मेरे अंदर से  कोई टूट रहा है

महसूस दूसरों को न होने दिया कभी,
दुख अपना झेलते हैं बहुत खुशदिली से हम । 

चेहरे पे आँसुओं ने लिखी हैं कहानियाँ 
कआइना देखने का मुझे हौसला  नहीं    


आदमी तो मिले ज़िंदगी में बहुत
दिल  तड़पता रहा आदमी के लिए । 

जो पराए हैं उन अपनों को बहुत याद किया
दिल ने टूटे हुए रिश्तों  को बहुत याद किया

सोमवार, 14 अक्टूबर 2013

SAROJ KUMAR MISHRA

परिधि नाप कर पूरी देखी 
एक लगी तुम सबसे न्यारी 
क्या कह कर तुम्हे पुकारू 
ओ दूर देश की राजकुमारी | | 

एक नजर भर के जो देखा फागुन चढ़ गया इन आँखों मे 
मधुमास लपेटे कोई चुनर सिमट गई नंगी शाखों में 
मन बेकाबू कोशिश करता दूर गगन मे उड़ जाने की 
करता हें वो बाते अक्सर तारो से तुम्हे सजाने की 

सावन बनकर छा जाऊं में 
जो बन जाओ तुम फुलबारी 
क्या कह कर तुम्हे पुकारू 
ओ दूर देश की राजकुमारी |

छोड़ न पाँऊ हाँथ तुम्हरा बड़े जतन के बाद मिली हो 
मीलो तक फैले मरुथल में ज्यो बसंत की प्रथम कली हो 
तन मेरा था खंडहर जैसा तुमने जिसमे रंग भर दिए 
परत परत मावस रातो पर तुमने जगमग दीप धर दिए 

मन करता मधुवन वारु तुम पर
पर तुम हो मधुवन से प्यारी 
क्या कह कर तुम्हे पुकारू 
ओ दूर देश की राजकुमारी | | 

मुझको छोड़ के अब न जाना चाहे जितनी कठिनाई हो 
चाहें रचे किसी की मेहँदी या बजती शहनाई हो 
उस अम्बर से इस धरती तक तुम जिसका एक सहारा हो 
उसका जीना होगा मुश्किल जिसने तुम पर मन हारा हो 

मै तो बना तेरा चितचोर 
करो तुम कितनी पहरेदारी 
क्या कह कर तुम्हे पुकारू 
ओ दूर देश की राजकुमारी | |____सरोज मिश्र

SAROJ KUMAR MISHRA

छोड़ कर पतवार नावे चल पड़ी है किस दिशा में चाँद भी मद होश होकर डूबता जाता निशा में बंद शतदल पर किरन , की माधुरी ज्यो गीत गाये हर भ्रमर का दिल जला है आज प्रिय का ख़त मिला है व्योम वैभव रूप का सब लिख दिया है शेष चुम्बन हेतु रीता हाशिया है और कोमल पुष्प रति का, रूप की आभा बिछाये दर्प का दर्पण गला है आज प्रिय का ख़त मिला है लिख दिए बीते सपन मनुहार लिखते दूरियों में प्रीति का विस्तार लिखते फिर वही छल पाश से, आँचल बचाये एक लम्बा सिलसिला है आज प्रिय का ख़त मिला है -------------------------------------------सरोज मिश्र ----

रविवार, 13 अक्टूबर 2013

SAROJ KUMAR MISHRA

पंख यह कितना उड़े, तुम खो गये आकाश बनकर
देह से ना और खेलो , अब प्रिये उपवास बनकर
आदि से हो अंत तक, बस एक मेरा ही नियंत्रण 
आ मिलो मुझसे कोई तुम, पर्व का अवकाश बनकर 

---------------------- सरोज मिश्र-----------------------

कल एक मुक्तक लिखा था ,मन विवश कर रहा था उसमे कुछ परिवर्तन के लिए ,सो कर दिया ------और अब मित्रो के हवाले कर रहा हू 

मरना पड़ता हे रोज उसे , जो जीता हे उपकारो मे 
ऐसे गिरी नही घर की छत , हे दोष कोई दीवारों मे
प्रतिभाए सब हुई उपेछित राजनीति की मनमर्जी हे 
जुगनू राजा घोषित हो गये ,सूरज के दरबारों मे 
******************सरोज मिश्र****************


अजब तुम्हरी दुनिया देखी ,अजब लगे दस्तूर 
महफ़िल जिनके नाम सजी थी वे महफ़िल से दूर 
कतरब्योत की तरकीबो के रंग बड़े थे गहरे
कलम पड़ी हे माथा फोड़े , गले हुए मशहूर 

----------------------------सरोज मिश्र ------------------- 

SAAROJ KUMAR MISHRA

दो आँखों के मिल जाने से 
कोई मीत नही बन जाता ,
सरगम कह देने से यारो 
कोई संगीत नही बन जाता ,
दीवारे बेशक सूनी हो पर 
दिल में तस्वीर जरूरी हे ,
कागज कलम अछरो से ही 
कोई गीत नही बन जात। 
सरोज कुमार मिश्र



क्या राजे ,क्या महराजे अपनी घर घर शोहरत है
मधुवन पतझर चन्दा तारे , ये सब मेरी बदोलत है 
तुमको जिसदिन लगे जरुरत आना ,सब कुछ ले जाना 
एक कलम कुछ कोरे पन्ने ,बस कवि कि इतनी दौलत है ----------सरोज मिश्र -------

SAROJ KUMAR MISHRA

मरना पड़ता हे रोज उसे , जो जीता हे उपकारो मे 
ऐसे गिरी नही घर की छत , हे दोष कोई दीवारों मे
प्रतिभाए सब हुई उपेछित राजनीति की मनमर्जी हे 
जुगनू राजा घोषित हो गये ,सूरज के दरबारों मे 
******************सरोज मिश्र********



पंख ये कितना उड़े, तुम खो गये आकाश बनकर
देह से ना और खेलो , तुम प्रिये उपवास बनकर
आदि से हो अंत तक, बस एक मेरा ही नियंत्रण 
आ मिलो ऐसे कोई, तुम पर्व का अवकाश बनकर 

---------------------- सरोज मिश्र---------------------



पंख यह कितना उड़े, तुम खो गये आकाश बनकर देह से ना और खेलो , तुम प्रिये उपवास बनकर आदि से हो अंत तक, बस एक मेरा ही नियंत्रण आ मिलो ऐसे कोई, पर्व का अवकाश बनकर ---------------------- सरोज मिश्र----------------------- 

 कितने आकर बसे नयन मे,कितने मन से निकल गए ,
हम रहे कभी सन्नाटो से ,तो कभी शोर बन मचल गए ,
जिसने हमको जैसा देखा ,हम उसके अनुरूप दिखे ,
धरा हाँथ पर हाँथ किसी ने ,पानी से हम पिघल गए ।

SAROJ KUMAR MISHRA

मेरे समस्त मित्रो को समर्पित मेरा नया गीत 

मै खुद को चौसर पर हारू ,
और किसी की जीत बनो तुम
ऐसा तो तय नही हुआ था "

धीरज धरते सदा किनारे 
नदियों ने तोडी मर्यादाए 
सुख निर्मोही ढीट बड़ा है 
दुःख तो आये बिना बुलाये 
खो देना ही पा लेना हे 
मंत्र समझकर रहे पूजते 
हमने तब सयंम को साधा 
जब पाने के अबसर आये 

में बन जाऊ नियम पुराना 
नई नबेली रीत बनो तुम
ऐसा तो तय नही हुआ था "

मैंने सावन को देखा हे 
कितने रूप कलश छलकाते 
कुछ बसंत देखे हे मैंने 
महज फूल पर प्यार लुटाते 
रूपनगर के इन भवरो की 
चाहत में बस आकर्षण था
नागफनी को मिली सजाबट 
कमल कीच में है सकुचाते 

मै बन जाऊ वैराग्य विजन का 
मधुर अधर का गीत बनो तुम 
ऐसा तो तय नही हुआ था "
---------------------------------"सरोज मिश्र

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

2013

पिछली  पोस्ट  के करीब  एक  वर्ष  के बाद  आया हूँ  , ग्लूकोमा  के होते  हुए  अभी  जिंदगी
अपनी राह पर चल रही है  जिंदगी  हर जगह चलती है  यहाँ  भी  और और वहाँ  भी  . आज जब  यूरोप , चीन , भारत  ठिठुर रहा  है तब वोह कहते हैं की  ऑस्ट्रेलिया  मैं  भीषण  गर्मी  है

है न ये जीवन  के  अलग अलग  रंग  और  आदमी  हर रंग मैं जीता है

शमा हर रंग मैं जलती है  सहर  होने तक,
आदमी  जीता  है  बस शाम होने तक

ज़िन्दगी   की  शाम  जो  हर  शाम की  तरह  ज़रूर  आती  है
पिछले  वर्ष  माताश्री  एकदम से  चली  गईं  बहुत अजीब  लगता है
अब उनसे बात  करने को दिल करता  है  अब  लगता  है  और  शिद्दत  से अहसास  होता है  की हमको  तो बहुत  बातें   करनी  थीं  जब  वोह पास  थीं  तो  ये  गुमान   था की  वोह  हैं  तो  ये  सोचा भी  नहीं  था  की एकदम  से  वोह  सोते  सोते  सुबह  के  वक़्त   जो  सहर  का  वक़्त  होता  है  उस  वक़्त   हम  सबको
छोड़ कर  चल  दें  गी ...........................................................

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

Gloucoma

काला -मोतिअबिंद   कितना छोटा सा नाम  है  कितना कम बदनाम  है  मगर  जिसको  होता है वो ही जानता है की वो कैसे  तिल तिल कर के चलता है और उसको हर समय जीवन का अंत दीखता है क्योंकि हर मार्ग बंद दीखता है.


एक ज़रा आहट न हुई ख़त्म सफ़र होने तक,
ऐ उम्र रवां तू कितने दबे  पाऊँ चली.




वैसे  तो  इलाज  की  बहुत  सी   दुकानें  हैं   मगर  सब ही  पैसा  कमाने के  सिर्फ  बहाने  हैं   मरीज़  से 
किसी   को  कोई  दिलचस्पी नहीं है..

सोमवार, 1 अगस्त 2011

अचल लक्छमन विशवास

अभी   तो   देखने   में  जवान   थे   और  उत्साह  नव-जवानों   का  था   और  एक  दिन   सुबह  उठकर  एख्बार  देखा  तो  ये  दुखद  समाचार  भी  पढ़ा  की  वोह  नहीं  रहे   ,  हम  को ये  मालूम  है  की   अब  ऐसी  ख़बरों  में  अधिकतर  ऐसे  ही  लोगों  का  नाम  होगा  जिनको  हम  जानते  हैं   मगर  अचल जी    से  तो  सिर्फ  तीन  मुलाक़ात  हो  सकीं   वोह  भी   जौहरी  साहेब  की  महरबानी  से.

ऐसे  लोग  ही  याद  किये  जाते  हैं   क्या  बात  थी ?    अपना  वोह  एक  अलग  छाप  छोडते थे   मगर  अब  तो  दूरी  बहुत  बढ़  गई  है  ये  कैसा   सफ़र  है  हम  साथ  साथ  चलते  हैं   एक  ही    गाडी  है   मगर  किसके  स्टेशन  कब  आएगा   कोई  नहीं  जानता 


ज़िन्दगी     ज़िन्दगी     ज़िन्दगी      कितनी  बेवफा  है 

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

ओंकार सिंह राठोर " अपरिचित'

ओंकार  सिंह  राठोर " अपरिचित'


सत्यबोध   {  काव्य  संग्रह  }

ISBN -81-8212-084-5

मांडवी  प्रकाशन  , गाजिअबाद  ( उ . प्र . )  - २०१२०१ 

जन्म  ६ जुलाई, १९३५ , जन्म स्थान   ग्राम तथा  डाकखाना  - महोई , थाना  मोहम्मदाबाद ,
जिला  - फरुखाबाद 

संपर्क ... ५०९, मोहम्मद जे , चित्रा टाकीज  के पास  , शाहजहांपुर  मोबाइल  नॉ    09305776120

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

हम और तुम






'क' से कबूतर 'ख' से खरगोश,
'ग' से गधा या कहीं-कहीं  गणेश ,
इन्हीं शब्दों की ही जोड़-तोड़ मैं कटी है 
सारी उम्र
इन्हीं शाब्दिक गठ-बन्धनों  मैं बंधे हैं,
रिश्ते और सम्बन्ध .
कभी-कभी एक छोटी कंकड़ी नुकीली सी 
उठा कर  खुरच  दिया था --
तुम्हारा नाम ,
पेड़ के मुलायम तने पर "अर्जुन; के 
अब उम्र की ढलान पर 
ह्रदय रोग की पीड़ा में,
डाक्टर की सलाह से जब 
"अर्जुन'  के वृछ  की छाल 
उतारने गया 
तो वही नाम , वही समबन्ध 
जो उकेरे  थे  पेड़ पर 
अट्टहास कर उठे 
मेरी रेत-सी फैली नापुन्सुकता पर .


                    अरविन्द मिश्र

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

मत पकड़ो किस्मत की बैसाखियाँ


मत पकड़ो किस्मत की बैसाखियाँ 
मत पकड़ो !
अन्यथा तुम्हारा श्रम , अपाहिज हो जाएगा ,
और तुम ,किस्मत पर आश्रित हो जाओगे,
तब तुम्हारे पेट की आग ,
तुम्हारी किस्मत बुझा सके गी क्या ?
बीमार माँ-बाप  की दावा दिला सके गी क्या ?
बच्चों के कपडे ,फीस दिला सके गी क्या ?
नहीं,हरगिज़  नहीं ! क्यों नहीं लेते  अपनी टांगों का सहारा 
कमज़ोर सही अपाहिज नहीं हैं .
तभी अपनी आवश्यकतायें पूरी कर सको गे.
अन्यथा 
सदैव किस्मत के अत्यचार सहोगे.


                          अचल लक्छमन विशवास 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

,कफ़न

हर धर्म में 
शव पर डाला जाने वाला कपडा ,कफ़न होता है 
हम
हिन्दू ,मुसलमान , सिख, इसाई  बना सकते है 
पूजा के तरीके बदल सकते हैं ,
धर्मध्वज  अलग-अलग  रंग के बना सकते हैं,
धर्म के नाम पर हिंसा , आगज़नी, अत्याचार करा सकते हैं,
लेकिन कफ़न का रंग नहीं बदल सकते ,
कफ़न का नाम नहीं बदल सकते,
कफ़न हर मानव को अपने गले लगाता है,
इसलिए सभी धर्मों से सम्मान पाता है,
क्योंकि कफ़न मानव धर्म  मानता है 
मानव सेवा ही जानता है.
                                                    अचल लक्छ्मन विशवास 



शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

रूपशूलिता

रूपशूलिता
बहुत बार चाहा , में शूलों का दर्द कहूं 
किन्तु एक रूप उतर आता है गीतों में.


जब भी में आया हूँ फूलों के मधुबन में ,
शूलों से भी  मैंने रूककर  बातें की हैं .,
फूलों ने अगर दिए मकरंदित स्वप्न मधुर ,
शूलों ने भी  मुझको दुःख की रातें दी हैं.


बहुत बार चाहा दुःख सहकर भी मौन रहूँ ,
वरवास एक  रूप गुनगुनाता है गीतों में,


मेरे मन पर यदि है जादू मुस्कानों का ,
आँसू की भाषा भी जानी पहचानी है ,
एक अगर राधा है ब्रज के मनमोहन की ,
दूजी तो घायल यह मीरा देवानी है.


बहुत बार चाहा है  आँसू के साथ बहूँ ,
किन्तु एक रूप  मुस्कराता है गीतों में.




                                                     क्रिश्नाधार मिश्र 

शुक्रवार, 21 जनवरी 2011


विदूषक     अरविन्द  मिश्र 

fonw"kd
Hkxoku lp crkuk]
D;k rqEgsa viusa HkDr
fonw"kd dh rjg utj ugha vkrs &
lR; dguk]
eaxykpj.k ;k efgek c[kku dk rjhdk
gsyqflus'ku esa rqels ckr djus dh chekjh
ekufld foÑr HkDr
izLrqr djrs gSa & vkosnu i=
;k izsf"kr djrs gSa & ,d f'kdk;rh i=
layXu djrs gSa & fMek.M uksV
^fjD;wth'ku* dh laLrqfr dks vkrqj HkDr
dksf'k'k djrs gSa
nsus dks rqEgsa ^lqfo/kk 'kqYd*
ty foghu es?knwr ls HkDr
nsrs gSa nLrd rqEgkjs }kj ckj&ckj
rks lp gS izHkw
rqe viuh gh cukbZ Ñfr ij
eqLdqjkrs t:j gksxs
tks ctk jgh gS
viuh gh [kky ihV dj

गबहाई  अरविन्द  मिश्र 

xokgh
rqe ges'kk iwNrs gks
D;k dj ldsxh dfork \
pyks eSa iwNrk g¡w
D;k dj lds rqe \
ekSu& cl ekSu -------- rks lquksa
ftUgksaus ^^izse gh bZ'oj gS** dgk
lcls T;knk [kwu cgk;k]
ftUgksaus vuq'kklu ds ifo= xzUFkksa dh nqgkbZ nh
mUgksaus vius vU;;k;h vkSj vkrkrk;h :i dks
lc ij Fkksiusa dh dksf'k'k dh
/keZ;q) ds uke ij
ftUgksaus lH;rk vkSj laLÑfr dh Js"Brk
dks loksZifj crk;k]
os twBu Hkjh laLÑfr vkSj yaxM+h lH;rk
ihB ij
vlH; pky esa
tks ftl okrkZ dks fpYykdj iznf'kZr djrk gS
ogh ugha dj ikrk &
tksj ls cksydj
vlR; yknks er
fpYykvksa er & D; dj lds gks rqe \
jk"Vª izse dh onhZ igudj
jk"Vªh; lqj{kk ds uD'ks csaprs jgsa]
ek;k eksg feF;k gS
mins'k nsrs &
flDdksa esa rqyrs jgs rqe
ydhjsa
pyks ekuk
rqe ;q)ksa ls ugha]
laf/k;ksa ls ijkftr gq;s gksA
;g Hkh rks lR; gS
rqe ;q) dh d'ked'k ls xqtjrs oDr
xhrk ds Lojksa dh [kkst djrs gks
rqEgkjs pfj= esa 'kkfey gks x;k gS
NksVs&NksVs ;q)ksa ls Hk;Hkhr gksdj
laf/k;ksa dh ckr djus yxuk]
vkj ikj dh yM+kbZ dk
pfj=&uSfrdrk ls lEc) gksrk gS
;g vki [kwc tkurs gks]
ijkftrksa dh HkhM+ esa
,d la'k;xzLr O;fDRkA
Bhd dgrs gks 'kk;n
rqEgsa gj O;fDr yxrk gS
Vk¡x [khpusa okyk
rqe vuqi;ksxh vFkZ cks/k ryk'krs D;ksa gks \
tc yksx Vk¡x [khprs gSa
rks dneksa dh o<+h nwfj;k¡
eafty dks ikl ys vkrh gS
^fxjuk ugha gS* ;g n`<+rk vko';d gS
tc cM+h ydhj {kerk oku gksrh gS
rc Vk¡x [khprha ydhjsa
'keZlkj gksdj NksVh jg tkrh gSA
कुछ तो है
ऐ खुदा दे चंद आंसू,याद में उसकी बहा लूं
मेरी आंखों के समंदर, होंठ जिसके पी चुके हैं।

कांप उठा फ़िर से दरिया, सर से लेकर पांव तक,
लग रहा आदम बेटी प्यार में डूबी यहीं है।

ओह नन्ही चिड़िया
जव बहुमंगिला ईमारत के पीछे से
लाल लाल आँखे तरेरता सूर्य
मेरी खिड़की पर झांकता है
तुम पंजो से सलाखे पकड़ कर लटक जाती हो ओह नन्ही चिड़िया /
वल्कानी में लगा फूल जब मुस्कान बिखेर  देते है
वहति बयार में
फूल आगे पीछे ऐसे झूमते है
मनो मस्जिद में वच्चे कर रहे हो हफिज़ा
तुम बच्चो के स्वर में गाने लगती हो ओह नन्ही चिड़िया /
में बिस्तेर पर बैठा और तुम रोशाव्दन पर
तुमसे आँखे मिलते ही मैं बंद कर लेता हूँ अपनी आँखे
इस आशा से कि आँखे पर तुम
रखोगी  अपना हाँथ / पंजा और
पूछोगी  कौन ?
मैं कहूँगा मेरी विटिया ओह नन्ही चिड़िया


अरविन्द मिश्र को मिला शिवांशु स्म्रति सम्मान

अरविन्द मिश्र  को मिला शिवांशु  स्म्रति सम्मान  


शाहजहांपुर : चौथा शिवांशु  स्म्रति सम्मान   नगर के चर्चित व्यंगकार को दिया गया . भुवनेश्वर प्रसाद शोध  संस्थान की ओर से गाँधी पुस्तकालय में  आयोजित इस समारोह  में ओमकार सिंह राठोर  की कृति " भारत के वीर बालक बालिकाएँ " का विमोचन भी किया गया .
मुख्य  अतिथि स्वतंत्रता  संग्राम सेनानी  बसंत लाल खन्ना  व विशिस्ट अतिथि  राजकुमार सांख्यधर  तथा राम प्रसाद शुक्ल  ने नगर के वरिष्ट गीतकार  ओम प्रकाश अडिग  की अध्यछ्ता में सम्मान दिया . जिसमें उन्हें ११ सौ रूपये  का चेक ,स्मृति चिन्ह , प्रशस्ति  पत्र  दिए गए . इस अवसर पर श्री खन्ना ने कहा की शिवांशु जी का व्यक्तित्व बेलौस था.  जो केवल मंच पर खडे होकर  ही आधा काम  कर देते थे .
इस मौके पर अख्तर शाहजहांपुरी ,दिनेश रस्तोगी , डा. अवनीश  मिश्र  , केशव चंदर मिश्र , सतीश चंदर शर्मा , श्रीकांत ,ज़रीफ़ मलिक , व सुरेश चंदर शर्मा ने भी सम्भोदित किया . इस सम्मान समारोह में विवेक शर्मा , अरुण शर्मा , शरद शर्मा  व शुभम शर्मा का योगदान रहा 

बुधवार, 19 जनवरी 2011

मन्त्र=आवेश

मन्त्र=आवेश 
अपरिचित छड़\
अपरिचित  वातावरण 
क्यों महक उठता है 
समेट लेता है मुझे 
संम्पूर्ण ,


तुम्हारे स्पर्श से 
मन्त्र पूरित 
किसी वस्तु को 
देखकर ?


किसी प्रितिध्वनी पर 
बज उठता है 
ले बनकर
ह्रदय  का संतूर
तुम्हारी किसी भी 
वस्तु को छूकर ?


क्यों महक उठती है
अंगराग सी मेरी 
दुर्गंधित पार्थिविता 
तुम्हारी ऊष्मा के 
एक अंश को पाकर ?
बताओ तो क्यों ?


                  क्रिश्नाधार  मिश्र