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शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

रूपशूलिता

रूपशूलिता
बहुत बार चाहा , में शूलों का दर्द कहूं 
किन्तु एक रूप उतर आता है गीतों में.


जब भी में आया हूँ फूलों के मधुबन में ,
शूलों से भी  मैंने रूककर  बातें की हैं .,
फूलों ने अगर दिए मकरंदित स्वप्न मधुर ,
शूलों ने भी  मुझको दुःख की रातें दी हैं.


बहुत बार चाहा दुःख सहकर भी मौन रहूँ ,
वरवास एक  रूप गुनगुनाता है गीतों में,


मेरे मन पर यदि है जादू मुस्कानों का ,
आँसू की भाषा भी जानी पहचानी है ,
एक अगर राधा है ब्रज के मनमोहन की ,
दूजी तो घायल यह मीरा देवानी है.


बहुत बार चाहा है  आँसू के साथ बहूँ ,
किन्तु एक रूप  मुस्कराता है गीतों में.




                                                     क्रिश्नाधार मिश्र 

बुधवार, 19 जनवरी 2011

मन्त्र=आवेश

मन्त्र=आवेश 
अपरिचित छड़\
अपरिचित  वातावरण 
क्यों महक उठता है 
समेट लेता है मुझे 
संम्पूर्ण ,


तुम्हारे स्पर्श से 
मन्त्र पूरित 
किसी वस्तु को 
देखकर ?


किसी प्रितिध्वनी पर 
बज उठता है 
ले बनकर
ह्रदय  का संतूर
तुम्हारी किसी भी 
वस्तु को छूकर ?


क्यों महक उठती है
अंगराग सी मेरी 
दुर्गंधित पार्थिविता 
तुम्हारी ऊष्मा के 
एक अंश को पाकर ?
बताओ तो क्यों ?


                  क्रिश्नाधार  मिश्र 

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

KRISHNAADHAAR MISHRA

अभी यादों के हैं मधुवन ,
अभी वादों के साए हैं.
अभी ही तो मिलन के छंद ,
मैं ने गुनगुनाये हैं .

अभी कैसे विरह के दर्द वाले गीत गाऊं मैं ,
अभी कैसे निराशा से भरे आंसू बहाऊं मैं .

....................क्रिश्नाधार मिस्र

रविवार, 12 सितंबर 2010

क्रिशनाधार मिस्र.

गंध गूँज
सुधियों के सतरंगी इन्द्रधनुष ,
गीतों के बहुरंगी सप्त -कलश ।

मन के गगन में बनाए,
उर के सदन में सजाय तुमने ।

विस्मरति ने छीने ये रंग कई बार ,
मौसम ने किये तीव्र व्यंग कई बार ,
बनकर तब ज्योत्स्ना की रूप किरण ,
धर कर नव किसलय से अरुण चरण ।

भावों के द्वार जगमगाए ,
रागों के गुलमोहर उगाये तुमने ।

हर दिवस बसंत ,हर निष् सुगंध्हार ,
दोनों मिल करैं पुष्प के प्रबल प्रहार ,
दिवसों को देंबासंती चितवन ,,
रातों को गंधों के नंदन वन ।

नींदों के द्रव्य सब चुराय ,
लोरी के गीत गुन्ग्ने तुमने।


..............................क्रिशनाधार मिस्र.

गुरुवार, 12 अगस्त 2010

ATEET-ANSH BY KRISHNAADHAAR MISHRA

आज   फिर   उस  जैसा ,
हो गया है पावस का ये दिन ,
धरती के भीगे अंगों से उठकर ,
खिड़की के रास्ते ,
आने लगी है
यौवन  क़ी सुगंध १


जीवित हो उठे हैं 
 मेरे अन्दर वे पल 
जब मेरी शिराओं में ,
झनझनाकर बज उठती थी 
 सुन्दरता क़ी फुहरिल खिलखिलाहट 
चरों और बस गई थी 
चुपचाप अनकहे  रिश्तों क़ी एक बस्ती
मेरी प्रणय लीला के दर्शक 
कुटुम्बी बन गए थे 
जुड़ गया था उन सभी से
खून से अधिक एक गाढ़ा रिश्ता

रविवार, 11 जुलाई 2010

KRISHNAADHAAR MISRA

सुधि-विहंग


अनवरत याद की यह पराकाष्टा
दिन सपन ,यामिनी जागरण हो गई .

भोर आया ,जागे कल्पना के विहग
उड़ चले था जहां पर तुम्हारा शयन ,
स्वर हज़ारों बदलकर सुनाये तुम्हें 

जाग जायें की जिससे उनीदे नयन .

तुम जगे भोर की अरुणिमा जग गई 
यह पवन चन्दनी गीत गाने लगी 
भोर की अजनबी सी किरन जो चुभी 
ओस बन वेदना मुस्कराने लगी.

दर्द  ने कुछ अचानक छुआ इस तरह
रागिनी प्राण का आभरण   हो गई.

क्यों पपीहा रहा जागता रात भर ,
क्यों पिकी आम्रवन को गुंजाती रही ,
क्यों भ्रमर पागलों सा भटकता रहा 
क्यों किरन उपवनों को सजाती रही ,

क्यों लहर पूछती सागरों का पता ,
धार को ले चली कौन सी कामना ,
एक परिचय तुम्हारा मुझे कह गया ,
कर रहे ये सभी प्यार की साधना .

एक दीवानगी जो स्वयम प्रशन थी 
आज वोह व्यक्तिगत आचरण हो गई.

शुक्रवार, 9 जुलाई 2010

KRISHNAADHAAR MISRA

सांध्य -संकेत


बूढी इमारतों की  बेतरतीब ,
पंक्तियों मैं लगे ,
कंगूरों ने ,
सांझ को अपने अनरूप ,
काट , झांट दिया है.
कमरे की खिड़की  से झांकता आकाश ,
उस पार से कूद कर आने के
 प्रयत्न में
काफी छत -विछत हो गया है ,
धीरे-धीरे
कोने में छिपे
अंधेरे नें
हम दोनों के बीच ,
मेज़ भर दूरी को भरना आरम्भ
कर दिया है.
इसी दूरी में से गुज़रते हम देख चुके हैं .
पल , घंटे , और ...........................!
इस पारदर्शी समय पर ,
लिखे जा चुके हैं ,कितने ही ,
मौन के संवाद .
अचानक मौन भंग करते हुए
तुमने कहा
" अँधेरा हो गया है , बत्ती जला दें  "
बत्ती जलाकर हाथ जोड़
नमन मुद्रा में जब तुमने सर झुकाया ,
मुझे लगा -
सारा उजाला तुम्हारी  मांग में ,
भरकर सिंदूरी हो गया

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बुधवार, 7 जुलाई 2010

KRISHNAADHAAR MISRA

मर्त्तिका  ही  तो


जन्मों से मिलन हमारा है फिर भी
जाने क्यों मेरी प्यास अधूरी .

लगता अब तक  मिलने की सारे क्रम
थे  केवल  बीते युगों के भ्रम
आओ अब तो हम कुछ इस तरह मिलें
हों पराभूत सम सीमाएँ निर्मम.

मुझको छूकर भी तुम अनछुई रहीं,
कौन सी नियति यह मजबूरी है

सारे नकारते  हैं यह गठ्बंदन
किस किस से दूर करें अपनी अनबन  
बोलो तुम को में कैसे देख सकूं
जब तक शरीर के हम पर  अवगुंठन

में निकट तुम्हारे कितने भी आऊं
लगता   प्रकाश    वर्षों कि दूरी है.

मंगलवार, 6 जुलाई 2010

GROUND REALTIES REALISATION BY A POET

कुछ   चुनी  हुई पंक्तियाँ   




एक सुमन कि चाह में  बोलो भला क्यों ,
एक पूरी  वाटिका वीरान कर  दूं 


................................क्यों  विरह  के दाह को सहता रहूँ  जब ,
                                स्रष्टि  सारी  कर  रही  परवाह मेरी 


एक मिलन  की खातिर तुमने देखो तो , 
कैसी कैसी  चीज़ों   का बलिदान लिया 


..........................................एक   जीवन   क़र्ज़  हैं  जिस पर हज़ारों  
                                           किस तरह केवल  तुम्हें  उपहार दूं


 ..................................................................क्रिशनाधार   मिश्र

पंथाभिसार

तुम बिखर जाना हमारी राह मैं बन चांदनी,
तो सुमन खिल जाऐगा
फिर खुद बहार जायेगी

दीप लेकर साथ आओ तुम
नहीं ये चाहता मैं ,
सिर्फ राहों की दिशा का ज्ञान दे देना ,
राह के संकट बटाओ तुम,
नहीं ये चाहता मैं,
सिर्फ चलने का मुझे वरदान दे देना
राह की ठोकर करे अपमान ,
जब मेरे पगों का
मैं कहता तुम उन्हें सम्मान दे देना ,
जब निराशा के अंधेरे
घिर कर मुझको सताएँ ,
याद आकर बस किरन-मुस्कान दे देना

तुम निखर आना हमारी आह में वन रागिनी ,
तो तपन मिट जायेगी ,
फिर खुद फुहार जायेगी

..............................................क्रिशनाधार मिस्र

सोमवार, 5 जुलाई 2010

बीजपल

थके उबे तिरस्कृत पल भी ,
चुरा लाते हैं ,
तुम्हारी फेनिल हंसी ,
गंधित मुस्कान ,
और
उत्सवी पहचान ,
बहुत चुपके ।
वोह पहचान
दुबक जाती है
कहीं मेरे में
मेरे जड़ को
चेतन करने
मेरे अधिगमन को
अध्यात्म बनाने


.................क्रिशनआधार मिस्र

रविवार, 4 जुलाई 2010

गंध गूँज

सुधियों के सतरंगी इन्द्रधनुष ,
गीतों के बहुरंगी सप्त -कलश ।

मन के गगन में बनाए,
उर के सदन में सजाय तुमने ।

विस्मरति ने छीने ये रंग कई बार ,
मौसम ने किये तीव्र व्यंग कई बार ,
बनकर तब ज्योत्स्ना की रूप किरण ,
धर कर नव किसलय से अरुण चरण ।

भावों के द्वार जगमगाए ,
रागों के गुलमोहर उगाये तुमने ।

हर दिवस बसंत ,हर निष् सुगंध्हार ,
दोनों मिल करैं पुष्प के प्रबल प्रहार ,
दिवसों को देंबासंती चितवन ,,
रातों को गंधों के नंदन वन ।

नींदों के द्रव्य सब चुराय ,
लोरी के गीत गुन्ग्ने तुमने।


..............................क्रिशनाधार मिस्र.

अगर तुम आ न जाते कुसुमई मुस्कान से सजाकर
धरा पर यह बिछी सारी बहारें मूक रह जातीं .

घटा आती पहन जल बिन्दुओं की पायलें ,गाती ,
ठुमक उठतीं शिलाएँ झूम आकाशी मेर्दंगों पर ,
बिज्लिओं की हंसी से मेदिनी आकाश मिल जाते ,
हवाएँ गीत लिख जातीं नदी के सुप्त अंगों पर

......क्रिश्नाधार मिश्रा

शनिवार, 3 जुलाई 2010

ये सिन्दूरी छितिज पशचिमी , ये सोये-सोये बादल ,
रंगों के दानी बन बैठे छूकर तेरा अरुणाचल .

शाहजहांपुर जनपद के वरिष्ट एवं हमसब के मित्र कवि " क्रिशनाधार मिश्र " कि पुस्तक


" विरंदावन सारा " { काव्य संग्रह }


प्रथम संस्करण २००५