AJAY GUPTA लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
AJAY GUPTA लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 13 जनवरी 2011

पगले कुछ तो धीर धर

तुम तो रेंगे ,सदा समय की ,खींची हुई लकीर पर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .


तुम ने ही तो बड़े प्यार से ,
सींची क्यारी शूल की,
तुमने ही तो  क़दम-क़दम पर ,
रोपी पोध बबूल की ,
चिंतित क्यों हो , जबकि बेहया ,
उग आया उद्यान में ,
सोच-समझकर , जाँ-बूझकर ,
तुमने ही तो भूल की .


तुम तो फंसते रहे ,मुश्किलें  खुद अपनी तामीर कर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .


बाल-अरुण को दोपहरी से ,
पहले भाई शाम क्यों,
उदय्लित सागर की जपती,
लहर-लहर हरी नाम क्यों ?
कोई तो अंगडाई ले , जागे ,
जलकर दे रौशनी ,
सभी तीलियाँ ,दियासलाई में ,
करती विश्राम क्यों ?


धरकर चरण मचलना सीखो , कातिल की शमशीर पर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .


तुम चाहो तो तापी हथेली  से ,
सहला दो शीत को,
मीत गीत से ही कुरेद दो ,
ज्वालामई  अतीत को ,
फौलादी संकल्पों से चाहो तो ,
रेत  बना डालो ,
नरता की छाती पर उठती हुई ,
अन्य की भीत को,


लेकिन तुम तो फूल चढ़ाते , किस्मत की तस्वीर पर,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर 


तुमने समझा शलभ बाबरे !
बर्रयों की भीर को ,
गंगाजल समझा तुमने ,
गंदे नाले के नीर को ,
किसी तरह से भी गुज़ार लो ,
जीवन के अवशेष दिन ,
जान रहा , अनुमान रहा ,
तेरे अंतस की पीर को ,


फिर से हंस चुगे गा मोती ,पगले कुछ तो धीर धर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर 


                                    अजय गुप्त 

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

श्री गाँधी पुस्तकालय

श्री   गाँधी पुस्तकालय , चौक  में ०४ .१२.२०१०  की साँय ०६ बजे कवी सम्मलेन अवम मुशाइरा  का गंगा-जमुनी कार्यक्रम सम्पन्न हुआ  कौमी एकता पखवाडे के सन्दर्भ में हुए इस  सुरिचिपूर्ण  कार्यक्रम में  वरिष्ट शायर श्री खालिद अल्वी ने अध्य्छ्ता  करते हुए श्रोताओं को सोचने  को मजबूर करते हुए कहा.




" गुरूरो  किब्र  वालों को कोई  भी  नाम मत देना ,
सुना है नींद में चलने की बीमारी भी होती है. "

इस अवसर पर उस्ताद शायर साग़र वारसी  ने तरन्नुम के साथ गुनगुनाया :


"अच्छी फसलें हो रही हैं फिर भी खुशहाली नहीं ,
एक दहकाँ कह रहा था ,खैरो-बरकत उड़  गई . "


कौमी एकता पर सटीक समाधान प्रस्तुत करते गाँधी पुस्तकालय  के सचिव , नवगीत के स्थापित  हस्ताछर  अजय गुप्त ने अपने चिरपरिचित  शैली  में कहा 

"खुशनुमा सुहाना मौसम है , हो चुकी तपिश कुछ तो कम है ,
बीते मौसम की बदअमनी,हम भी भूलें तुम भी भूलो .

वरिष्ठ गीतकार श्री बृजेश मिश्र  ने अपनी विशिष्ट शैली में प्रेम गीत गुनगुनाते हुए वाह वाही  बटोरी.

" साथी अभी मौन मत तोड़ो थोडा भ्रम  बना रहने दो ,
मालूम नहीं सुबह  कैसी हो ,ये तम अभी घना रहने दो. "


अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध शाएर  श्री अख्तर शाह्जाहंपुरी ने ये शेर कहा.
"अजब एक भीड़ सी है मेरे अदंर,
में तनहा हो के भी  तनहा नहीं हूँ,
में तरो-ताज़ा  दिखाई दूंगा "अख्तर"
किसी बीमार का चेहरा नहीं हूँ. "


स्थापित कविवर  डॉक्टर त्रिपाठी ने गीत की परिभाषा  करते हुए प्रशंसानिये प्रेम गीत पढ़ा 
"नहीं आवश्यक  की कुछ बोलें ,भावनाएँ जब सघन हो लें ,
करैं कितने ही बहाने पर ,नयन मन के भेद सब खोलें ,
प्राण का संगीत समझो ,मौन को ही गीत समझो . "

गोष्ठी कप गति प्रदान करते हुए  श्रोताओं की करतल ध्वनि  के मध्य गुनगुनाते  महबूब शाहजहांपुरी ने  कहा 

"गलत में था न ,हमसाया गलत था ,
किसी ने उसको समझाया गलत था ."

प्रसिद्ध शायर डा. ममनून ने अपनी बात कुछ इस तरह से कही ,श्रोता उनके तरन्नुम पर झूम उठे
"शोर कैसा है आज बस्ती में , क्या कोई दरमियान से उठता है ."
जब भी सहरा की सिम्त बढ़ता हूँ,एक बगूला वहाँ से उठता है "

मध्य रात्री तक चली काव्य गोष्टी में रसग्य श्रोताओं की उपस्तिथ में  सर्वश्री  ख्याल्गो लल्लन बाबू ,असगर यासिर , दीपक कंदर्प  ज्ञानेंद्र मोहन ज्ञान ,फहीम बिस्मिल , उमेश चन्द्र सिंह  ने काव्य  पाठ किया . गोष्ठी का सफल संचालन  व्यंगकार श्री अरविन्द मिश्र ने किया . आभार ज्ञापन पुस्तकालय के  संरछक  भू.पु.जोइंट कोमिशनोर श्री विजय कुमार ने किया 



" अपना घर है यहाँ मत डरो, जैसा जी चाहे वैसा करो ".......लल्लन बाबू

"खुदा जाने होंगे ख़त्म कब  लम्हे सफ़र वाले ,
बड़ी शिद्दत से याद आते हैं  मुझको अपने घर वाले."    .......असगर यासिर.


नई ज़मीन नए आसमान वाले हैं,

हमारे ख्वाब बहुत आनबान वाले हैं ,
हमारे खून में है  शामिल महक वफाओं की ,
की हम शहीदों के ही खानदान वाले हैं "................फहीम बिस्मिल

गुरुवार, 18 नवंबर 2010

AJAY GUPTA

मन होता

पता नहीं क्यों हम नितांत रह गए अकेले,
मन होता है हमको भी खो देते मेले .
हमको आज नहीं ,कल दिखता
या कल दिखता .
बहुत थके हम ढोते-ढोते
अंतर्मुखता .
योवन ने कब ली अंगडाई जान न पाया ,
याद नहीं कब बचपन में गुब्बारे खेले .
कठिन काम है
ज़िम्मेदारी का शव ढोना
सरल नहीं है
एक व्यवस्था का बुत होना .
चाहा पुरवा या पछुवा के साथ उडूं मैं
किन्तु फ्रेम मैं कास जाने के दंशन झेले

रविवार, 14 नवंबर 2010

AJAY GUPTA

समाधान  खोजें


साथ-साथ उड़ सकें जहां ,
वोह आसमान खोजें .
सब मिलकर रह सकें जहां ,
ऐसा मकान खोजें.

मौसम के आतंकवाद से ,
सहमी किरन परी.
भावुकता की गौरय्या पर ,
जमकर बर्फ गिरी .
शवांस सहज चल सके  बंधू 
वोह तापमान खोजें .


गुरुवार, 28 अक्टूबर 2010

AJAY GUPTA

अनचाहे ही


इस्पात नहीं ,हम हाड-मॉस के पुतले ,
कैसे अटूट रहने का दंभ करें.
अपने क़द से क़द दरवाजे का,
छोटा  हमें दिखा .
झुक कर आओ स्पष्ट अछरों ने
आदेश  लिखा.

तेरी बस्ती में एक ज़िन्दगी जीने के खातिर ,
हम क़दम क़दम पर अनचाहे ही कितनी बार मरे.

हम उनपर फिसले जो छिलके
अक्सर तुम ने फेंके.
यों सहज नहीं था सरेआम जो
हम घुटने टेकें .

जब मात्र सदाशयता  का  ओढा खोल दुराशा ने ,
आशीष -स्नेह  के वचनों में भी घुले मिले  फिकरे.

कट चुकी पतंगों या
अपदस्थ नवाबों जैसे हैं.
कुछ मजबूरी है दीमक लगी
किताबों जैसे हैं .

अब ट्रेल नहीं हो चुके ताश के तरेपंवे  पत्ते ,
किस तरह कहो ,किस ढंग से  , जय यात्रा प्रारंभ करें.

बुधवार, 27 अक्टूबर 2010

अजय गुप्ता

कांटे हुए  एलाट


द्वारा

अजय गुप्ता

प्रकाशक

श्री गाँधी पुस्तकालय , शाहजहांपुर  उत्तर प्रदेश

AJAY GUPTA

जीवित अभी है आग

शीत में काँपता-ठिठुरता  दिन ,
सूर्य ढ़ोय जा  रहा  निरुपाय .

शीत ,इतनी शीत है उस पर,
एक मुठी भी नहीं भिछ्ती ,
कसमसाता सूर्य का अंतर ,
किन्तु, प्रत्यंचा  नहीं खिंचती.

क्यों,अंगारों की कगारों पर ,
उतर आया राख का समुदाय .

क़हक़हे जी भर लगाते हैं ,
मोम की मीनार वाले लोग.
एक दीपक भी जला उसपर ,
तुरत बिठलाया गया  आयोग .

क्यों न जाने लोग गीता में,
खोजते हैं आज पीटक निकाय .

लोग कहते हैं किताबों में ,
हैं अभी भी आदमी जीवित .
ह्रदय में जीवित अभी है आग,
और आँखों में में नमी जीवित,

ह्रदय  का लावा दिशाओं में , भरे ,
कुछ तो करो शीघ्र  उपाय .