डॉ . जनेश्वर वर्मा { एम् .ए. हिंदी , भाषा विज्ञानं } पी. एच . डी . द्वारा लिखित पुस्तकें
१ मार्क्सवाद के मूल सिद्धांत .
प्रकाशक समाजवादी साहित्य सदन , ७ जाप्लिन मार्ट , नजीराबाद लखनऊ
प्रथम बार मार्च १९७० मूल्य चार रु.
2. प्रेमचंद एक मार्क्सवादी मूल्याँकन
प्रकाशक ग्रंथम , रामबाग कानपूर-२०८०१२
१९८६ मूल्य रु. १२५/-
इस जनपद का हिंदी साहित्य मैं भी योगदान रहा है . यह केवल शहीद नगरी ही नहीं है. हमारा यह प्रयत्न हो गा की जनपद शाहजहांपुर के इस योगदान को उजागर करैं.
गुरुवार, 13 जनवरी 2011
महान क्रांतिकारी शिव वर्मा
अमर शहीद भागर सिंह के साथी ,
महान क्रांतिकारी शिव वर्मा .
लेखक रमेश विद्रोही
मूल्य रु . २/-
स्वर्गीय शिव वर्मा स्वयं भी एक लेखक थे
उनके द्वारा लिखित कुछ पुस्तकें.
१. संस्मर्तियाँ { क्रांतिकारी शहीदों के संस्म्रनात्म्क रेखा चित्र }
लेखक शिव वर्मा
समाजवादी साहित्य सदन कानपूर
११/२६४ सूटर गंज कानपूर
१९६९ मूल्य रु. ८/-
२. मौत के इंतज़ार में
लेखक शिव वर्मा
शहीद स्मारक प्रकाशन लखनऊ -२२६००२
शहीद नगर , पुराना किला
१९९६ मूल्य रु. ३०/=
3. शहीद भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ
सम्पादक शिव वर्मा
प्रथम संस्करण सितम्बर ,१९८७
4.. मार्क्सवाद परिचयमाला
महान क्रांतिकारी शिव वर्मा .
लेखक रमेश विद्रोही
मूल्य रु . २/-
स्वर्गीय शिव वर्मा स्वयं भी एक लेखक थे
उनके द्वारा लिखित कुछ पुस्तकें.
१. संस्मर्तियाँ { क्रांतिकारी शहीदों के संस्म्रनात्म्क रेखा चित्र }
लेखक शिव वर्मा
समाजवादी साहित्य सदन कानपूर
११/२६४ सूटर गंज कानपूर
१९६९ मूल्य रु. ८/-
२. मौत के इंतज़ार में
लेखक शिव वर्मा
शहीद स्मारक प्रकाशन लखनऊ -२२६००२
शहीद नगर , पुराना किला
१९९६ मूल्य रु. ३०/=
3. शहीद भगत सिंह की चुनी हुई कृतियाँ
सम्पादक शिव वर्मा
प्रथम संस्करण सितम्बर ,१९८७
4.. मार्क्सवाद परिचयमाला
समाजवादी साहित्य सदन कानपूर
११/२६४ सूटर गंज कानपूर ,
१९७२ मूल्य ४५ पैसे
पगले कुछ तो धीर धर
तुम तो रेंगे ,सदा समय की ,खींची हुई लकीर पर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .
तुम ने ही तो बड़े प्यार से ,
सींची क्यारी शूल की,
तुमने ही तो क़दम-क़दम पर ,
रोपी पोध बबूल की ,
चिंतित क्यों हो , जबकि बेहया ,
उग आया उद्यान में ,
सोच-समझकर , जाँ-बूझकर ,
तुमने ही तो भूल की .
तुम तो फंसते रहे ,मुश्किलें खुद अपनी तामीर कर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .
बाल-अरुण को दोपहरी से ,
पहले भाई शाम क्यों,
उदय्लित सागर की जपती,
लहर-लहर हरी नाम क्यों ?
कोई तो अंगडाई ले , जागे ,
जलकर दे रौशनी ,
सभी तीलियाँ ,दियासलाई में ,
करती विश्राम क्यों ?
धरकर चरण मचलना सीखो , कातिल की शमशीर पर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .
तुम चाहो तो तापी हथेली से ,
सहला दो शीत को,
मीत गीत से ही कुरेद दो ,
ज्वालामई अतीत को ,
फौलादी संकल्पों से चाहो तो ,
रेत बना डालो ,
नरता की छाती पर उठती हुई ,
अन्य की भीत को,
लेकिन तुम तो फूल चढ़ाते , किस्मत की तस्वीर पर,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर
तुमने समझा शलभ बाबरे !
बर्रयों की भीर को ,
गंगाजल समझा तुमने ,
गंदे नाले के नीर को ,
किसी तरह से भी गुज़ार लो ,
जीवन के अवशेष दिन ,
जान रहा , अनुमान रहा ,
तेरे अंतस की पीर को ,
फिर से हंस चुगे गा मोती ,पगले कुछ तो धीर धर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर
अजय गुप्त
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .
तुम ने ही तो बड़े प्यार से ,
सींची क्यारी शूल की,
तुमने ही तो क़दम-क़दम पर ,
रोपी पोध बबूल की ,
चिंतित क्यों हो , जबकि बेहया ,
उग आया उद्यान में ,
सोच-समझकर , जाँ-बूझकर ,
तुमने ही तो भूल की .
तुम तो फंसते रहे ,मुश्किलें खुद अपनी तामीर कर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .
बाल-अरुण को दोपहरी से ,
पहले भाई शाम क्यों,
उदय्लित सागर की जपती,
लहर-लहर हरी नाम क्यों ?
कोई तो अंगडाई ले , जागे ,
जलकर दे रौशनी ,
सभी तीलियाँ ,दियासलाई में ,
करती विश्राम क्यों ?
धरकर चरण मचलना सीखो , कातिल की शमशीर पर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर .
तुम चाहो तो तापी हथेली से ,
सहला दो शीत को,
मीत गीत से ही कुरेद दो ,
ज्वालामई अतीत को ,
फौलादी संकल्पों से चाहो तो ,
रेत बना डालो ,
नरता की छाती पर उठती हुई ,
अन्य की भीत को,
लेकिन तुम तो फूल चढ़ाते , किस्मत की तस्वीर पर,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर
तुमने समझा शलभ बाबरे !
बर्रयों की भीर को ,
गंगाजल समझा तुमने ,
गंदे नाले के नीर को ,
किसी तरह से भी गुज़ार लो ,
जीवन के अवशेष दिन ,
जान रहा , अनुमान रहा ,
तेरे अंतस की पीर को ,
फिर से हंस चुगे गा मोती ,पगले कुछ तो धीर धर ,
में तो आया ,नागफनी के , सारे जंगल चीर कर
अजय गुप्त
बुधवार, 12 जनवरी 2011
वोह नहीं पुस्तक मिली
कौन से आधार थे,
जिन पर टिके थे हम.
दर्द की उन साफ़ आँखों में,
नहीं कोई.
एक दुनिया राह में यूँ ही -
यहाँ खोई,
कौन सी बाज़ार थी ,
जिसमें बिके हम थे ..
रुक गई है बात चलते ,
स्वार्थ पर भाई ,
एक सूरत बिन बताय ,
क्यों यहाँ आई ..
वोह नहीं निकले की जैसे,
कुछ दिखे हम थे .
याद कुछ भी रह न पाया ,
नाम या चेहरा ,
क्या हुआ जो धर लिया है ,
फूल का सहरा ..
वोह नहीं पुस्तक मिली ,
जिसमें लिखे हम थे.
ओमप्रकाश " अडिग'
जिन पर टिके थे हम.
दर्द की उन साफ़ आँखों में,
नहीं कोई.
एक दुनिया राह में यूँ ही -
यहाँ खोई,
कौन सी बाज़ार थी ,
जिसमें बिके हम थे ..
रुक गई है बात चलते ,
स्वार्थ पर भाई ,
एक सूरत बिन बताय ,
क्यों यहाँ आई ..
वोह नहीं निकले की जैसे,
कुछ दिखे हम थे .
याद कुछ भी रह न पाया ,
नाम या चेहरा ,
क्या हुआ जो धर लिया है ,
फूल का सहरा ..
वोह नहीं पुस्तक मिली ,
जिसमें लिखे हम थे.
ओमप्रकाश " अडिग'
शनिवार, 8 जनवरी 2011
कुंवारे गीत
कुंवारे गीत
अडिग
यौवन द्वारा , यौवन के लिए , यौवन के गीत
स्नेह पोच्केट बुक्स , शाहजहांपुर वर्ष १९७८ मूल्य ३/-
प्रीत कंवारी है तुम्हारी ,
गीत कुंवारे हैं हमारे ,
इस तरह मिलते रहेंगे ,
हम सदा संध्या सकारे,
सुख जन्म की वीथिका में ,
या कभी आँगन द्वारे .
नींद कुंवारी है तुम्हारी ,
स्वप्न कुंवारे हैं हमारे .
हम कभी तो व्यस्तता में ,
स्रष्टि का विशवास हारे .
औ कभी हम मुघ्दता से,
छल रहे श्रींगार धारे .
कामना कुवारी तुम्हारी ,
भाव कुंवारे हमारे.
डूबकर भी झांकते क्यों ?
हैं नदी में सुख सितारे ?
क्यों छिपा पाता नहीं मन ,
प्यार के अविरल उजारे ?
देह सरि कुवारी तुम्हारी
तीर कुवारे हमारे
अडिग
अडिग
यौवन द्वारा , यौवन के लिए , यौवन के गीत
स्नेह पोच्केट बुक्स , शाहजहांपुर वर्ष १९७८ मूल्य ३/-
प्रीत कंवारी है तुम्हारी ,
गीत कुंवारे हैं हमारे ,
इस तरह मिलते रहेंगे ,
हम सदा संध्या सकारे,
सुख जन्म की वीथिका में ,
या कभी आँगन द्वारे .
नींद कुंवारी है तुम्हारी ,
स्वप्न कुंवारे हैं हमारे .
हम कभी तो व्यस्तता में ,
स्रष्टि का विशवास हारे .
औ कभी हम मुघ्दता से,
छल रहे श्रींगार धारे .
कामना कुवारी तुम्हारी ,
भाव कुंवारे हमारे.
डूबकर भी झांकते क्यों ?
हैं नदी में सुख सितारे ?
क्यों छिपा पाता नहीं मन ,
प्यार के अविरल उजारे ?
देह सरि कुवारी तुम्हारी
तीर कुवारे हमारे
अडिग
बुधवार, 29 दिसंबर 2010
अडिग को जनपद विभूति अवार्ड
शाहजहांपुर फेस्टिवल - २०१० का पुरूस्कार वितरण के साथ समापन
साहित्य के छेत्र के ओमप्रकाश " अडिग" को जनपद
विभूति - २०१० से अलिंक्रित किया गया
शायद अब ठण्ड पडे
पेड़ों ने दाल दिए फूल,
पात के दुकूल,
शायद अब ठण्ड पडे!!
साफ़ लगा होने,
है नीला आकाश,
पर्त लगी माटी की,
सागर के पास!!
बैठ रही नीचे है धूल!
शायद अब ठण्ड पडे!!
आया है श्वेत खगो का ,
पहला झुण्ड,
संध्या के माथे पर,
चाँद का त्रिपुंड,
तीखे कुछ और हुए शूल,
शायद अब ठण्ड पडे!!
कौन सके संख्याएँ ,
तारों की गिन !
छोटे आरम्भ हुए-
होने हैं दिन !!
दोहराने प्यार लगा भूल,
शायद अब ठण्ड पडे !!
शनिवार, 25 दिसंबर 2010
थोड़ी देर और बैठो तुम
थोड़ी देर और बैठो तुम
मेरे जीवन की आशा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !
सब आते जाते रहते हैं ,
भव नदिया में सब बहते हैं,
जीवन में अपनी पीड़ा को-
सब रोते हैं,सब कहते हैं!
मेरे गीतों की भाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !
इतनी भीड़ कहाँ होती है ,
अपना दोष नहीं धोती है,
चलते फिरतों की आंखें भी-
नम होती हैं औ रोटी हैं !!
मेरी प्यासी अभिलाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !
होता कौन यहाँ अपना है ,
अपनापन केवल सपना है ,
नींद नहीं जाने क्यों आती?
किस आशा में फिर जगना है?
मेरे प्राणों की श्वांसा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !!
ओमप्रकाश ' अडिग' { संकुल}
सदस्यता लें
संदेश (Atom)