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शनिवार, 15 जनवरी 2011

परमाणु  बम से जूझती  हुई दुनिया  के लिए " अडिग'  का  सन्देश


मौत का बढ़ता हुआ सामान देखकर ,
दुनिया को बचाने की कुछ फ़िक्र कीजिये .


ज्ञान से  विज्ञान से तू  ये सवाल कर ,
दुनिया नहीं रही तो क्या करेंगे हम.


उम्मीद बच न पाएगी अटम की मार से ,
फिर भी दुआ करो की दुनिया बची रहे.


                                    ओमप्रकाश  " अडिग"

बुधवार, 12 जनवरी 2011

वोह नहीं पुस्तक मिली


कौन से आधार थे,
जिन पर टिके थे हम.
दर्द की उन साफ़ आँखों में,
नहीं कोई.
एक दुनिया राह में यूँ ही -
यहाँ खोई,
कौन सी बाज़ार थी ,
जिसमें बिके हम थे ..
रुक गई है बात चलते ,
स्वार्थ पर भाई ,
एक सूरत बिन बताय ,
क्यों यहाँ आई ..
वोह नहीं निकले की जैसे,
कुछ दिखे हम थे .
याद कुछ भी रह न पाया ,
नाम या चेहरा ,
क्या हुआ जो धर लिया है ,
फूल का सहरा ..
वोह नहीं पुस्तक मिली ,
जिसमें लिखे हम थे.

ओमप्रकाश " अडिग'

शनिवार, 8 जनवरी 2011

कुंवारे गीत

कुंवारे  गीत 


           अडिग 
यौवन  द्वारा , यौवन के लिए , यौवन के गीत

स्नेह पोच्केट बुक्स , शाहजहांपुर    वर्ष १९७८   मूल्य   ३/-


प्रीत  कंवारी है तुम्हारी ,
गीत कुंवारे हैं हमारे  ,
                                     इस तरह मिलते रहेंगे ,
                                     हम सदा संध्या सकारे,
                                     सुख जन्म की वीथिका में ,
                                     या कभी आँगन द्वारे .
नींद कुंवारी है तुम्हारी ,
स्वप्न कुंवारे हैं हमारे .
                                      हम कभी तो व्यस्तता में ,
                                      स्रष्टि का विशवास हारे .
                                      औ कभी हम मुघ्दता से,
                                      छल रहे श्रींगार धारे .
कामना कुवारी तुम्हारी ,
भाव कुंवारे  हमारे.
                                      डूबकर भी झांकते  क्यों ?
                                      हैं नदी में सुख सितारे ?
                                      क्यों छिपा पाता नहीं मन ,
                                      प्यार के अविरल उजारे  ?
देह सरि कुवारी तुम्हारी  
तीर कुवारे  हमारे 


                                                               अडिग 
                                     

बुधवार, 29 दिसंबर 2010





अडिग को जनपद विभूति अवार्ड 


शाहजहांपुर फेस्टिवल - २०१० का पुरूस्कार वितरण के साथ समापन 




साहित्य के छेत्र के ओमप्रकाश " अडिग" को जनपद 


विभूति - २०१० से अलिंक्रित किया गया


शायद  अब ठण्ड पडे


पेड़ों ने दाल दिए  फूल,
पात के दुकूल,
शायद अब ठण्ड पडे!!
साफ़ लगा होने,
है नीला आकाश,
पर्त लगी माटी की,
सागर के पास!!
बैठ रही नीचे  है धूल!
शायद अब ठण्ड पडे!!
आया है श्वेत खगो का ,
पहला झुण्ड,
संध्या के माथे पर,
चाँद का त्रिपुंड,
तीखे कुछ और हुए शूल,
शायद अब ठण्ड पडे!!
कौन सके संख्याएँ ,
तारों की गिन !
छोटे आरम्भ हुए-
होने हैं दिन !!
दोहराने प्यार लगा  भूल,
शायद अब ठण्ड पडे !!





शनिवार, 25 दिसंबर 2010

थोड़ी देर और बैठो तुम



थोड़ी देर और बैठो तुम 
मेरे जीवन की आशा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !
सब आते जाते रहते हैं ,
भव नदिया में सब बहते हैं,
जीवन में अपनी पीड़ा को-
सब रोते हैं,सब कहते हैं!
मेरे गीतों की भाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !
इतनी भीड़ कहाँ होती है ,
अपना दोष नहीं धोती है,
चलते फिरतों की आंखें भी-
नम होती हैं औ रोटी हैं !!
मेरी प्यासी अभिलाषा बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !
होता कौन यहाँ अपना है ,
अपनापन केवल सपना है ,
नींद नहीं जाने क्यों आती?
किस आशा में फिर जगना है?
मेरे प्राणों  की श्वांसा  बन ,
थोड़ी देर और बैठो तुम !!   


                 ओमप्रकाश  ' अडिग'               { संकुल}


    

संकुल

संकुल 


ओमप्रकाश "अडिग'


विकास  प्रकाशन   शाहजहांपुर [ उ .प्र.]


मूल्य  १००/-


इस्बं : ८१-०४५५५-९-६



सोमवार, 25 अक्टूबर 2010

OM PRAKASH 'ADIG'

शताब्दी  के  पुत्रों  !   सुनो  !


मुझ से पूर्व की पीढ़ी ने , बबूल के पेड़ बोये थे ,
और अब ,जबकि हम जन्म चुके हैं ,
उनपर  कांटे  आ रहे हैं ,
ऐसा मुझे मालूम है ,की पुरानी कहावतें गलत हो रही हैं ,
अब बोता कोई है ,काटकर ढोता कोई है .
पूरी  शताब्दी ,जिसमें मैं ने जन्म लिया ,
बबूल के काँटों से छलनी है
रक्त  से लाल है ,
कई महायुधों और  युधों  के बीच ,
जब मुझे अवकाश मिला .
मैं ने सोचा :

मुझे क्यों जन्माया गया ?
बबूल का जंगल क्यों उगाया  गया ?
उत्तर दे भी तो कौन  ?
सभी  मेरे समवयस्क  हैं .
इसी शताब्दी के  हैं .
काँटों से  बिंधे हैं .
अत :  इस शताब्दी के पुत्रों .
जब तुम्हें युद्ध से समय मिले
और दर्द कुछ मालूम हो ,
तो बबूल के जंगल साफ़  करना ,
और वहाँ आम के  वृछ  लगाना.