रविवार, 26 फ़रवरी 2012

Gloucoma

काला -मोतिअबिंद   कितना छोटा सा नाम  है  कितना कम बदनाम  है  मगर  जिसको  होता है वो ही जानता है की वो कैसे  तिल तिल कर के चलता है और उसको हर समय जीवन का अंत दीखता है क्योंकि हर मार्ग बंद दीखता है.


एक ज़रा आहट न हुई ख़त्म सफ़र होने तक,
ऐ उम्र रवां तू कितने दबे  पाऊँ चली.




वैसे  तो  इलाज  की  बहुत  सी   दुकानें  हैं   मगर  सब ही  पैसा  कमाने के  सिर्फ  बहाने  हैं   मरीज़  से 
किसी   को  कोई  दिलचस्पी नहीं है..

सोमवार, 1 अगस्त 2011

अचल लक्छमन विशवास

अभी   तो   देखने   में  जवान   थे   और  उत्साह  नव-जवानों   का  था   और  एक  दिन   सुबह  उठकर  एख्बार  देखा  तो  ये  दुखद  समाचार  भी  पढ़ा  की  वोह  नहीं  रहे   ,  हम  को ये  मालूम  है  की   अब  ऐसी  ख़बरों  में  अधिकतर  ऐसे  ही  लोगों  का  नाम  होगा  जिनको  हम  जानते  हैं   मगर  अचल जी    से  तो  सिर्फ  तीन  मुलाक़ात  हो  सकीं   वोह  भी   जौहरी  साहेब  की  महरबानी  से.

ऐसे  लोग  ही  याद  किये  जाते  हैं   क्या  बात  थी ?    अपना  वोह  एक  अलग  छाप  छोडते थे   मगर  अब  तो  दूरी  बहुत  बढ़  गई  है  ये  कैसा   सफ़र  है  हम  साथ  साथ  चलते  हैं   एक  ही    गाडी  है   मगर  किसके  स्टेशन  कब  आएगा   कोई  नहीं  जानता 


ज़िन्दगी     ज़िन्दगी     ज़िन्दगी      कितनी  बेवफा  है 

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

ओंकार सिंह राठोर " अपरिचित'

ओंकार  सिंह  राठोर " अपरिचित'


सत्यबोध   {  काव्य  संग्रह  }

ISBN -81-8212-084-5

मांडवी  प्रकाशन  , गाजिअबाद  ( उ . प्र . )  - २०१२०१ 

जन्म  ६ जुलाई, १९३५ , जन्म स्थान   ग्राम तथा  डाकखाना  - महोई , थाना  मोहम्मदाबाद ,
जिला  - फरुखाबाद 

संपर्क ... ५०९, मोहम्मद जे , चित्रा टाकीज  के पास  , शाहजहांपुर  मोबाइल  नॉ    09305776120

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

हम और तुम






'क' से कबूतर 'ख' से खरगोश,
'ग' से गधा या कहीं-कहीं  गणेश ,
इन्हीं शब्दों की ही जोड़-तोड़ मैं कटी है 
सारी उम्र
इन्हीं शाब्दिक गठ-बन्धनों  मैं बंधे हैं,
रिश्ते और सम्बन्ध .
कभी-कभी एक छोटी कंकड़ी नुकीली सी 
उठा कर  खुरच  दिया था --
तुम्हारा नाम ,
पेड़ के मुलायम तने पर "अर्जुन; के 
अब उम्र की ढलान पर 
ह्रदय रोग की पीड़ा में,
डाक्टर की सलाह से जब 
"अर्जुन'  के वृछ  की छाल 
उतारने गया 
तो वही नाम , वही समबन्ध 
जो उकेरे  थे  पेड़ पर 
अट्टहास कर उठे 
मेरी रेत-सी फैली नापुन्सुकता पर .


                    अरविन्द मिश्र

मंगलवार, 15 फ़रवरी 2011

मत पकड़ो किस्मत की बैसाखियाँ


मत पकड़ो किस्मत की बैसाखियाँ 
मत पकड़ो !
अन्यथा तुम्हारा श्रम , अपाहिज हो जाएगा ,
और तुम ,किस्मत पर आश्रित हो जाओगे,
तब तुम्हारे पेट की आग ,
तुम्हारी किस्मत बुझा सके गी क्या ?
बीमार माँ-बाप  की दावा दिला सके गी क्या ?
बच्चों के कपडे ,फीस दिला सके गी क्या ?
नहीं,हरगिज़  नहीं ! क्यों नहीं लेते  अपनी टांगों का सहारा 
कमज़ोर सही अपाहिज नहीं हैं .
तभी अपनी आवश्यकतायें पूरी कर सको गे.
अन्यथा 
सदैव किस्मत के अत्यचार सहोगे.


                          अचल लक्छमन विशवास 

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

,कफ़न

हर धर्म में 
शव पर डाला जाने वाला कपडा ,कफ़न होता है 
हम
हिन्दू ,मुसलमान , सिख, इसाई  बना सकते है 
पूजा के तरीके बदल सकते हैं ,
धर्मध्वज  अलग-अलग  रंग के बना सकते हैं,
धर्म के नाम पर हिंसा , आगज़नी, अत्याचार करा सकते हैं,
लेकिन कफ़न का रंग नहीं बदल सकते ,
कफ़न का नाम नहीं बदल सकते,
कफ़न हर मानव को अपने गले लगाता है,
इसलिए सभी धर्मों से सम्मान पाता है,
क्योंकि कफ़न मानव धर्म  मानता है 
मानव सेवा ही जानता है.
                                                    अचल लक्छ्मन विशवास 



शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

रूपशूलिता

रूपशूलिता
बहुत बार चाहा , में शूलों का दर्द कहूं 
किन्तु एक रूप उतर आता है गीतों में.


जब भी में आया हूँ फूलों के मधुबन में ,
शूलों से भी  मैंने रूककर  बातें की हैं .,
फूलों ने अगर दिए मकरंदित स्वप्न मधुर ,
शूलों ने भी  मुझको दुःख की रातें दी हैं.


बहुत बार चाहा दुःख सहकर भी मौन रहूँ ,
वरवास एक  रूप गुनगुनाता है गीतों में,


मेरे मन पर यदि है जादू मुस्कानों का ,
आँसू की भाषा भी जानी पहचानी है ,
एक अगर राधा है ब्रज के मनमोहन की ,
दूजी तो घायल यह मीरा देवानी है.


बहुत बार चाहा है  आँसू के साथ बहूँ ,
किन्तु एक रूप  मुस्कराता है गीतों में.




                                                     क्रिश्नाधार मिश्र