रविवार, 13 अक्टूबर 2013

SAAROJ KUMAR MISHRA

दो आँखों के मिल जाने से 
कोई मीत नही बन जाता ,
सरगम कह देने से यारो 
कोई संगीत नही बन जाता ,
दीवारे बेशक सूनी हो पर 
दिल में तस्वीर जरूरी हे ,
कागज कलम अछरो से ही 
कोई गीत नही बन जात। 
सरोज कुमार मिश्र



क्या राजे ,क्या महराजे अपनी घर घर शोहरत है
मधुवन पतझर चन्दा तारे , ये सब मेरी बदोलत है 
तुमको जिसदिन लगे जरुरत आना ,सब कुछ ले जाना 
एक कलम कुछ कोरे पन्ने ,बस कवि कि इतनी दौलत है ----------सरोज मिश्र -------

SAROJ KUMAR MISHRA

मरना पड़ता हे रोज उसे , जो जीता हे उपकारो मे 
ऐसे गिरी नही घर की छत , हे दोष कोई दीवारों मे
प्रतिभाए सब हुई उपेछित राजनीति की मनमर्जी हे 
जुगनू राजा घोषित हो गये ,सूरज के दरबारों मे 
******************सरोज मिश्र********



पंख ये कितना उड़े, तुम खो गये आकाश बनकर
देह से ना और खेलो , तुम प्रिये उपवास बनकर
आदि से हो अंत तक, बस एक मेरा ही नियंत्रण 
आ मिलो ऐसे कोई, तुम पर्व का अवकाश बनकर 

---------------------- सरोज मिश्र---------------------



पंख यह कितना उड़े, तुम खो गये आकाश बनकर देह से ना और खेलो , तुम प्रिये उपवास बनकर आदि से हो अंत तक, बस एक मेरा ही नियंत्रण आ मिलो ऐसे कोई, पर्व का अवकाश बनकर ---------------------- सरोज मिश्र----------------------- 

 कितने आकर बसे नयन मे,कितने मन से निकल गए ,
हम रहे कभी सन्नाटो से ,तो कभी शोर बन मचल गए ,
जिसने हमको जैसा देखा ,हम उसके अनुरूप दिखे ,
धरा हाँथ पर हाँथ किसी ने ,पानी से हम पिघल गए ।

SAROJ KUMAR MISHRA

मेरे समस्त मित्रो को समर्पित मेरा नया गीत 

मै खुद को चौसर पर हारू ,
और किसी की जीत बनो तुम
ऐसा तो तय नही हुआ था "

धीरज धरते सदा किनारे 
नदियों ने तोडी मर्यादाए 
सुख निर्मोही ढीट बड़ा है 
दुःख तो आये बिना बुलाये 
खो देना ही पा लेना हे 
मंत्र समझकर रहे पूजते 
हमने तब सयंम को साधा 
जब पाने के अबसर आये 

में बन जाऊ नियम पुराना 
नई नबेली रीत बनो तुम
ऐसा तो तय नही हुआ था "

मैंने सावन को देखा हे 
कितने रूप कलश छलकाते 
कुछ बसंत देखे हे मैंने 
महज फूल पर प्यार लुटाते 
रूपनगर के इन भवरो की 
चाहत में बस आकर्षण था
नागफनी को मिली सजाबट 
कमल कीच में है सकुचाते 

मै बन जाऊ वैराग्य विजन का 
मधुर अधर का गीत बनो तुम 
ऐसा तो तय नही हुआ था "
---------------------------------"सरोज मिश्र

शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

2013

पिछली  पोस्ट  के करीब  एक  वर्ष  के बाद  आया हूँ  , ग्लूकोमा  के होते  हुए  अभी  जिंदगी
अपनी राह पर चल रही है  जिंदगी  हर जगह चलती है  यहाँ  भी  और और वहाँ  भी  . आज जब  यूरोप , चीन , भारत  ठिठुर रहा  है तब वोह कहते हैं की  ऑस्ट्रेलिया  मैं  भीषण  गर्मी  है

है न ये जीवन  के  अलग अलग  रंग  और  आदमी  हर रंग मैं जीता है

शमा हर रंग मैं जलती है  सहर  होने तक,
आदमी  जीता  है  बस शाम होने तक

ज़िन्दगी   की  शाम  जो  हर  शाम की  तरह  ज़रूर  आती  है
पिछले  वर्ष  माताश्री  एकदम से  चली  गईं  बहुत अजीब  लगता है
अब उनसे बात  करने को दिल करता  है  अब  लगता  है  और  शिद्दत  से अहसास  होता है  की हमको  तो बहुत  बातें   करनी  थीं  जब  वोह पास  थीं  तो  ये  गुमान   था की  वोह  हैं  तो  ये  सोचा भी  नहीं  था  की एकदम  से  वोह  सोते  सोते  सुबह  के  वक़्त   जो  सहर  का  वक़्त  होता  है  उस  वक़्त   हम  सबको
छोड़ कर  चल  दें  गी ...........................................................

रविवार, 26 फ़रवरी 2012

Gloucoma

काला -मोतिअबिंद   कितना छोटा सा नाम  है  कितना कम बदनाम  है  मगर  जिसको  होता है वो ही जानता है की वो कैसे  तिल तिल कर के चलता है और उसको हर समय जीवन का अंत दीखता है क्योंकि हर मार्ग बंद दीखता है.


एक ज़रा आहट न हुई ख़त्म सफ़र होने तक,
ऐ उम्र रवां तू कितने दबे  पाऊँ चली.




वैसे  तो  इलाज  की  बहुत  सी   दुकानें  हैं   मगर  सब ही  पैसा  कमाने के  सिर्फ  बहाने  हैं   मरीज़  से 
किसी   को  कोई  दिलचस्पी नहीं है..

सोमवार, 1 अगस्त 2011

अचल लक्छमन विशवास

अभी   तो   देखने   में  जवान   थे   और  उत्साह  नव-जवानों   का  था   और  एक  दिन   सुबह  उठकर  एख्बार  देखा  तो  ये  दुखद  समाचार  भी  पढ़ा  की  वोह  नहीं  रहे   ,  हम  को ये  मालूम  है  की   अब  ऐसी  ख़बरों  में  अधिकतर  ऐसे  ही  लोगों  का  नाम  होगा  जिनको  हम  जानते  हैं   मगर  अचल जी    से  तो  सिर्फ  तीन  मुलाक़ात  हो  सकीं   वोह  भी   जौहरी  साहेब  की  महरबानी  से.

ऐसे  लोग  ही  याद  किये  जाते  हैं   क्या  बात  थी ?    अपना  वोह  एक  अलग  छाप  छोडते थे   मगर  अब  तो  दूरी  बहुत  बढ़  गई  है  ये  कैसा   सफ़र  है  हम  साथ  साथ  चलते  हैं   एक  ही    गाडी  है   मगर  किसके  स्टेशन  कब  आएगा   कोई  नहीं  जानता 


ज़िन्दगी     ज़िन्दगी     ज़िन्दगी      कितनी  बेवफा  है 

शुक्रवार, 4 मार्च 2011

ओंकार सिंह राठोर " अपरिचित'

ओंकार  सिंह  राठोर " अपरिचित'


सत्यबोध   {  काव्य  संग्रह  }

ISBN -81-8212-084-5

मांडवी  प्रकाशन  , गाजिअबाद  ( उ . प्र . )  - २०१२०१ 

जन्म  ६ जुलाई, १९३५ , जन्म स्थान   ग्राम तथा  डाकखाना  - महोई , थाना  मोहम्मदाबाद ,
जिला  - फरुखाबाद 

संपर्क ... ५०९, मोहम्मद जे , चित्रा टाकीज  के पास  , शाहजहांपुर  मोबाइल  नॉ    09305776120