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गुरुवार, 2 सितंबर 2010

AKHTAR SHAHJAHANPURI


मुझे जिंदगी का पता दे गया ,वो हाथों मैं बुझता दिया दे गया .

कोई अक्स जिसमें उभरता न था ,वो उस आइने को जिला दे गया.

मरी खाक तो  इतनी नाम भी न थी ,मगर वो तो पैकर नया दे गया

परिंदा फिजा मैं जो गुम हो गया ,मेरी फ़िक्र को रास्ता दे गया .

मैं अब खून का किस पे दावा करूँ ,की जब वो मुझे खून-बहा दे गया .

ज़मीं पर बुलंदी से आना तेरा ,तेरी अजमतों  का पता दे गया.

मेरे दिल पे "अख्तर''न दस्तक हुई,सदा देने वाला सदा दे गया.

शनिवार, 10 जुलाई 2010

AKHTAR SHAHJAHANPURI



जसे फ़िक्र हो कुछ नया कर चले,
रिवायत से दामन बचाकर चले.

हमारे लिए क्या किसी ने किया ?
किसी के  लिए हम भी क्या कर चले .

उसी के क़दम मंजिलें चूम लें,
जो रास्ते के पत्थर हटा कर चले

क़यामत की है तीरगी उसतरफ ,
चले जो भी शमाएँ जलाकर चले .

वही सुर्खरू होगा इस  जंग मैं ,
जो नेजे पर सर को सजाकर चले.

खुले कोई दरवाज़ा या बंद हो ,
सदा करने वाले सदा कर चले.

ये बज्मे-तखयुल है "अख्तर' यहाँ ,
कहो फ़िक्र से सर उठाकर चले.

गुरुवार, 8 जुलाई 2010

AKHTAR SHAHJAHANPURI

समंदर हूँ मुझे रुसवा न करना ,
मेरी वुसअत का तुम सौदा न करना.

येही पाकीज़गी की है निशानी ,
तुम इस  पोशाक  को  मैला  न करना

मुझे तन्हाइयां रास  आ गई हैं ,
मेरे बारे मैं अब सोचा  न करना .

उजाला हर वर्क पर लिख रहा हूँ ,
तुम इनको भूलकर काला न करना .

मेरे अहबाब ने सीखा है किस्से ,
ज़रा सी बात को अफसाना करना .

दरख्तों से कोई कहता है "अख्तर"
मुसाफिर हूँ मेरा पीछा न करना

बुधवार, 7 जुलाई 2010

AKHTAR SHAHJAHANPURI

धूप का  सायबान   


यह किस जुर्म की अब सज़ा दी गई ,
की शाखे -नशेमन जला दी गई.

जहां के मकीं हद से आगे बढे ,
वोह बस्ती ही एक दिन मिटा दी गई.

जो तस्वीर आँखों मैं रखने को थी
वोह बाज़ार मैं क्यों सजा दी गई.

मसीहाई का जिस ने दावा किया ,
तो ज़ख्मों की उसको क़बा दी गई.

अज़ल से जो वजहे-ताल्लुक रही ,
वही बात "अख्तर" भुला दी गई.